एक दायरा खींच रखा है उसने अपने इर्द-गिर्द,
कहती है इश्क़ से परहेज़ है;
पर सुस्त, लम्बे रास्तों पर, बेवजह,
उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से उलझ जाती है |

अंधेरे सिनेमा में,
रातों को रेस्तरां में,
बारिश से भीगी श्यामो में,
और कई और अनकहे जस्बातों में,
उसकी उँगलियाँ, मेरी उँगलियों में उलझ जाती है |

और आखरी मोड़ पर, अचानक,
मुझसे परे,
जैसे कभी वो मेरी हुई ही ना हो,
मेरे साथ, पर मुझसे दूर;
सुलझी उँगलियाँ, और खाली निगाहे लिए,
इश्क़ के ज़लज़ले को अपने भीतर थामे,
अचूक, पर पस्त |

उसका डर जायज़ है;
इश्क़ में मात और सब बर्बाद !
उसका डर मैं रोज़ जीता हूँ,
कसूर उँगलियों का है,
उनसे उलझ जाती है |

~ Poem © जयेश शर्मा
~ Art © yeevz_ .

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