दास्ताँ है ये “शहज़ादे” की
परदे से दिलों में उतर जाने की
“और क्या देखना है, आपसे दिल लगा के देख लिया”
तुम्हारे मुखातिब ने तुम्हें अब जाते हुए भी देख लिया
पर खैर इस अदावत में तुम्हारा क्या करना हो सकता है
मालूम है हमें: “सिर्फ इंसान गलत नहीं होते, वक़्त भी गलत हो सकता है”

तुम्हारे इस “कारवां” को हमारा सलाम है
ज़िन्दगी में तुम्हारा “जज़्बा” भी तुम्हारी तरह कमाल है
जब मन किया तुम्हारा, तुम “योगी” के साथ सूफी हो लिए
“गुंडे” में पुलिस, “पान सिंह तोमर” में तुम बागी हो लिए
यकीनन “मोंटी” की परेशानियां ज़हीन थी
जैसे तुम्हारी अदाकारी हमेशा महीन थी

“हमारी तो गाली पर भी ताली पड़ती है” से
“हाँ ट्रैन पर ही हूँ, लेकिन अपनी नहीं, दूसरी पर चढ़ गया” तक
“मोहब्बत है इसलिय जाने दिया, ज़िद होती तो बाँहों में होती” से
“बड़े शहरों की हवा और छोटे शहरों का पानी बड़ा खतरनाक होता है” तक
“डिअर इला, द फ़ूड वास् वैरी साल्टी टुडे” से
“वो राजमा चावल की तरह है – माँ का बनाया हुआ” तक
इरफ़ान भाई, तुम जुबां पर ऐसे चढ़े जैसे इश्क़
भूले से भी भुलाया न जा सके
और चाहो कितना भी, पाया न जा सके

“मकबूल” में मक़बूल या “पीकू” का चुलबुल राणा
“हासिल” में दबंग रणविजय या “मदारी” में एक बेबस बाप
परदे पर इरफ़ान भाई तुम थे, पर “इरफ़ान” कभी परदे पर नहीं था
और इरफ़ान भाई, मैं और ये ज़माना इसिलए आपके कामिल थे
कामिल थे
कामिल हैं
और कामिल रहेंगे

और अगर दरिया के उस पार ज़िन्दगी, या कोई और जहान है
तो यकीनन वो खूबसूरत ही होगा
आखिर अब आप जो वहां है

~ जयेश शर्मा

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